This poem is in honor of 2 categories of people:
1. With respect & gratitude for all those who support others sincerely (sharing knowledge, service etc.), in their real need
and also
2. For those gracious ones, who offer soulful blessings, if helped and cared-for, in their sick or difficult time.
अरे ठहरो, अभी तुम जाओ नहीं,
एक बात बताना बाकी है,
जब आये तुम, था कोई नहीं,
यह ध्यान कराना बाकी है ।
मन था भयभीत, घबराया कुछ ,
डरी, सहमी थी निगाहें,
थे कष्ट बहुत , दिल रहा बुझ,
कभी सिसकियाँ, कभी आहें ।
तुमने आकर कुछ सेवा की,
सहयोग दिया, सिखाया भी,
तुम आये थे , खैवइय्या बन,
कभी सेवक , कभी सहारे ।
जब आये तुम, था कोई नहीं,
यह याद दिलाना बाकी है ,
अरे ठहरो ,अभी तुम जाओ नहीं,
कुछ और बताना बाकी है ।
जब तुम आये, तब टीम बनी,
नित, रोज, नयी स्कीम बनी,
संघर्ष हुआ , आयी शक्ति,
दुःख दूर हुए, मिली भक्ति ।
कहा करो कार्य , सच्चाई से ,
'मैं साथ हूँ' , इस अच्छाई में,
तब खौफ मिटे, मुस्कान छायी,
हुए नतमस्तक, 'माँ' हैं आई'।
उत्साह बढ़ा, मनोबल आया ,
फिर जीने को, मन ललचाया,
ऐसे साथ को कम, ना आंको तुम,
बेशकीमती है, खुद भाँपो तुम।
जब आये तुम, था कोई नहीं,
यह फिर बतलाना बाकी है ,
थोड़ा ठहरे रहो, अभी जाओ नहीं
कुछ देना - दिलाना बाकी है ।
तो धन्यवाद्, ये लेते जाना,
भलाई सदैव-ही करते रहना,
हैं दुनिया में बेसहारे कई ,
ऐसी मैत्री बड़ी जरूरी भई।
क्या पता, किसे जरूरत कितनी ?
यह सोच, सिखलाना बाकी है,
था कोई नहीं ,जब तुम आये ,
फिर याद दिलाना बाकी है।
थे लोग तो बहुत ज़माने में ,
नाते में , रिश्तेदारों में ,
ना था कोई हमदर्द कहीं,
इसलिए कहा, था कोई नहीं ।
तुम ठहरे रहो, सच्चाई में,
इसलिए, दोहराना बाकी है,
था कोई नहीं , जब तुम आये,
एहसास कराना बाकी है।।

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